Q2781.निम्नलिखित में से किस पदार्थ का नाम स्त्रीलिंग में होता है?
- Aपीतल
- Bसोना
- Cकाँसा
- Dचाँदी
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अवधारणा: धातुओं के नामों का लिंग परंपरा से तय है; वाक्य में क्रिया/विशेषण लगाकर जाँचें।
- 'चाँदी चमकती है' — क्रिया स्त्रीलिंग, अतः चाँदी स्त्रीलिंग।
- 'सोना चमकता है', 'पीतल पुराना है', 'काँसा भारी है' — तीनों पुल्लिंग।
ट्रिक: शब्द के साथ 'अच्छा/अच्छी' लगाकर बोलें — जो 'अच्छी' के साथ सहज लगे, वह स्त्रीलिंग।
उत्तर: (D) चाँदी
Q2782.निम्नलिखित वाक्य को ध्यानपूर्वक पढ़ें और बताएं कि प्रस्तुत विकल्पों में से कौन-सा विकल्प रेखांकित शब्द का विलोम शब्द है? इस व्यवहार की मैं निंदा करता हूँ।
- Aस्तुति
- Bदुःख
- Cकृतघ्न
- Dस्तूति
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अवधारणा: निंदा = किसी की बुराई करना; विलोम = प्रशंसा करना।
- निंदा का विलोम 'स्तुति' (गुणगान)।
- 'स्तूति' गलत वर्तनी है — 'स्तु' में ह्रस्व उ।
- दुःख, कृतघ्न का निंदा से संबंध नहीं।
ट्रिक: समान दिखने वाले दो विकल्प हों तो सही वर्तनी वाला ही उत्तर होता है।
उत्तर: (A) स्तुति
Q2783.निम्नलिखित वाक्य में वर्तनी संबंधी त्रुटि की पहचान कर शुद्ध वाक्य का चयन करें। मजदूरी के इशारों पर बंदर करतब दिखा रहा था।
- Aमजदूर के इशारों पर बंदर करतब दिखा रहा था।
- Bमजदौर के इशारों पर बंदर करतब दिखा रहा था।
- Cमदारी के इशारों पर बंदर करतब दिखा रहा था।
- Dमदारी के इशारों पर बंदर करतब दिखा रही थी।
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अवधारणा: बंदर का खेल दिखाने वाले व्यक्ति को 'मदारी' कहते हैं।
- 'मजदूरी' (पारिश्रमिक) अर्थ में ग़लत है → 'मदारी'।
- 'बंदर' पुल्लिंग → 'दिखा रहा था' सही; (D) में 'रही थी' ग़लत।
ट्रिक: पहले शब्द का अर्थ ठीक करें, फिर लिंग-वचन से क्रिया मिलाएँ।
उत्तर: (C) मदारी के इशारों पर बंदर करतब दिखा रहा था।
Q2784.‘इंद्रियों को वश में रखने वाला’ उपरोक्त वाक्यांश के लिए एक शब्द होगा-
- Aइंद्रियातीत
- Bइंद्राणी
- Cइंद्रियानिग्रह
- Dइंद्रियजित
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अवधारणा: '…रखने वाला' व्यक्ति-वाचक शब्द माँगता है।
- जिसने अपनी इंद्रियाँ जीत ली हों, वह इंद्रियजित कहलाता है; इसे जितेंद्रिय भी कहते हैं।
- इंद्रियनिग्रह = संयम की क्रिया (व्यक्ति नहीं); इंद्रियातीत = पहुँच से परे; इंद्राणी = शची।
याद रखें: '-जित' = जीतने वाला: इंद्रियजित, विश्वजित, अपराजित का उलटा भाव।
उत्तर: (D) इंद्रियजित
Q2785.निम्नलिखित वाक्य को ध्यानपूर्वक पढ़ें और रेखांकित शब्द का पर्यायवाची अर्थ लिखें। किसान इस बात से बेखबर थे कि उनका कोई पीछा करता है।
- Aअनजानकार
- Bगाफिल
- Cलुप्त
- Dबेनजीर
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अवधारणा: बेखबर = अनजान, लापरवाह, जिसे ख़बर तक न हो।
- गाफिल (अरबी-फ़ारसी) = बेसुध, असावधान — समान अर्थ।
- लुप्त = ग़ायब; बेनजीर = अद्वितीय; 'अनजानकार' मानक शब्द नहीं।
याद रखें: 'बे-' उपसर्ग = बिना: बेखबर, बेनाम, बेघर।
उत्तर: (B) गाफिल
Q2786.‘वरदान’ शब्द का विलोम क्या होगा?
- Aवर
- Bदेय
- Cअभिशाप
- Dअनुदान
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अवधारणा: वरदान = कृपा से मिला शुभ आशीर्वाद।
- इसका उलटा = अभिशाप (शाप)।
- वर, देय, अनुदान — उलटे अर्थ नहीं देते।
याद रखें: युग्म याद करें: वरदान × अभिशाप, आशीर्वाद × शाप।
उत्तर: (C) अभिशाप
Q2787.दिए गए वाक्य के अशुद्ध भाग का चयन कीजिए। सभी विद्यार्थीगण अपनी-अपनी पढ़ने की किताबें निकालें।
- Aअपनी-अपनी
- Bनिकालें
- Cपढ़ने की किताबें
- Dसभी विद्यार्थीगण
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अवधारणा: 'सभी' और 'गण' दोनों बहुवचन/समूह-बोधक हैं; दोनों को साथ रखना पुनरुक्ति दोष है।
- 'सभी विद्यार्थीगण' में 'सभी' और 'गण' एक ही अर्थ दोहराते हैं।
- शुद्ध रूप: 'सभी विद्यार्थी' अथवा 'विद्यार्थीगण'।
- शेष तीनों अंश सही हैं।
याद रखें: सभी लोग ✔, लोगगण ✘; सभी छात्र ✔, सभी छात्रगण ✘ – 'सभी' के साथ 'गण' न लगाएँ।
उत्तर: (D) सभी विद्यार्थीगण
Q2788.निम्नलिखित में से किस वाक्य में एक-दूसरे के उचित विलोम शब्द का प्रयोग नहीं है?
- Aमैं उसका ऋणी अवश्य था परंतु अब उऋण हो गया।
- Bसुधार नहीं होना चाहिए, धीर व्यक्ति ही सफल होते हैं।
- Cअधीर नहीं होना चाहिए, धीर व्यक्ति ही सफल होते हैं।
- Dपरोक्ष नहीं होना चाहिए, प्रत्यक्ष व्यक्ति ही सफल होते हैं।
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अवधारणा: प्रश्न उस वाक्य का है जिसमें दोनों शब्द आपस में विलोम नहीं हैं।
- ऋणी × उऋण, अधीर × धीर, परोक्ष × प्रत्यक्ष — सही जोड़ियाँ।
- (B) में 'सुधार' और 'धीर' — कोई विलोम संबंध नहीं।
ट्रिक: 'नहीं' वाले प्रश्न में जो जोड़ी मेल न खाए, वही चुनें।
उत्तर: (B) सुधार नहीं होना चाहिए, धीर व्यक्ति ही सफल होते हैं।
Q2789.वर्तनी की दृष्टि से दिए गए वाक्य के त्रुटि वाले अंश को पहचानें- लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार विधायिका के प्रति उत्तरदाई होती है।
- Aके प्रति उत्तरदाई
- Bलोकतांत्रिक व्यवस्था में
- Cसरकार विधायिका
- Dहोती है
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अवधारणा: 'दायी' (देने/ज़िम्मेदार वाला) शब्द में 'यी' आता है, 'ई' नहीं।
- उत्तर + दायी = उत्तरदायी (ज़िम्मेदार)।
- 'उत्तरदाई' अशुद्ध; बाक़ी अंश शुद्ध।
ट्रिक: इसी तरह: स्थायी, सुखदायी, अनुयायी — सबमें 'यी'।
उत्तर: (A) के प्रति उत्तरदाई
Q2790.‘भेड़ चाल होना’ मुहावरे का सही अर्थ इनमें से क्या होगा?
- Aभेड़ के साथ चलना
- Bभेड़ पालना
- Cबिना विचार के अनुगामी होना
- Dभेड़ चराना
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अवधारणा: मुहावरे का अर्थ लाक्षणिक होता है, शाब्दिक नहीं।
- भेड़ें आगे वाली भेड़ के पीछे बिना देखे चल पड़ती हैं।
- भेड़ चाल = बिना सोचे दूसरों की नक़ल करना।
- भेड़ पालना/चराना/साथ चलना — केवल शाब्दिक अर्थ।
ट्रिक: मुहावरे के प्रश्न में शाब्दिक अर्थ वाले विकल्प पहले हटा दें।
उत्तर: (C) बिना विचार के अनुगामी होना
Q2791.रिक्त स्थान की पूर्ति सार्थक शब्द-युग्म से करें- जीवन में हमेशा ____ लगा ही रहता है।
- Aअनाप-शनाप
- Bराग-विराग
- Cमेला
- Dउखड़-खाबड़
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अवधारणा: खाली जगह में ऐसा जोड़ा चाहिए जो जीवन के लगातार चलने वाले भाव बताए।
- राग-विराग = लगाव और विरक्ति — जीवन में दोनों चलते रहते हैं।
- उखड़-खाबड़ (असमतल) और अनाप-शनाप (बेतुका) यहाँ अर्थहीन; 'मेला' तो युग्म ही नहीं।
याद रखें: 'राग' = प्रेम/आसक्ति, 'विराग' = वैराग्य; 'वि-' यहाँ विपरीत भाव देता है।
उत्तर: (B) राग-विराग
Q2792.‘जो किये जाने योग्य हो’ उपरोक्त वाक्यांश के लिए एक शब्द होगा-
- Aकर्णनीय
- Bअनुकरणीय
- Cकारित
- Dकरणीय
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अवधारणा: '-अनीय' प्रत्यय 'योग्य' का भाव देता है।
- जो करने योग्य हो = करणीय।
- अनुकरणीय = नक़ल/अनुसरण योग्य; कारित = करवाया हुआ; 'कर्णनीय' अशुद्ध।
याद रखें: -अनीय: पठनीय (पढ़ने योग्य), दर्शनीय, पूजनीय, करणीय।
उत्तर: (D) करणीय
Q2793.दिए गए वाक्यों के रेखांकित शब्दों के आधार पर संज्ञा की दृष्टि से अशुद्ध वाक्य का चयन करें-
- Aअपने स्वभाव में विनम्रता रखना उत्तम रीति है।
- Bअहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।
- Cशमा तो बहुत ही भोली है।
- Dतुमने अच्छा काम किया है, तुम्हें शाबाशी मिलनी चाहिए।
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अवधारणा: रेखांकित शब्द संज्ञा है या नहीं, यह परखें।
- विनम्रता, अहंकार, शाबाशी — भाववाचक संज्ञाएँ।
- 'भोली' गुण बताता है → विशेषण; इसकी संज्ञा 'भोलापन'।
याद रखें: '-ता', '-पन', '-आई' जुड़े शब्द प्रायः भाववाचक संज्ञा होते हैं।
उत्तर: (C) शमा तो बहुत ही भोली है।
Q2794.तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस की ____ चारों दिशाओं में फैली है। रिक्त स्थान की पूर्ति तत्सम शब्द द्वारा कीजिए।
- Aकीरत
- Bकिरती
- Cकीर्ति
- Dकिर्ती
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अवधारणा: तत्सम = संस्कृत से बिना बदले आया शब्द।
- यश के अर्थ में तत्सम रूप 'कीर्ति' (दीर्घ ई + र्ति)।
- 'कीरत' इसका तद्भव रूप; 'किरती', 'किर्ती' अशुद्ध।
याद रखें: तत्सम-तद्भव: कीर्ति → कीरत, अग्नि → आग, कर्म → काम।
उत्तर: (C) कीर्ति
Q2795.निम्नलिखित वाक्यांश के लिए एक सार्थक शब्द चुनिए- साथ-साथ पढ़ाई किए हुए
- Aसहकर्मी
- Bसहयात्री
- Cसहभागी
- Dसहपाठी
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अवधारणा: 'सह-' उपसर्ग = साथ।
- साथ पढ़ने वाला = सहपाठी (पाठ = पढ़ाई)।
- सहकर्मी → दफ़्तर/काम का साथी; सहयात्री → सफ़र का साथी; सहभागी → हिस्सेदार।
ट्रिक: 'सह' के बाद वाला भाग देखें — 'पाठ' पढ़ाई से जुड़ा है।
उत्तर: (D) सहपाठी
निर्देश (प्र. 96-100): निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
गांधीजी ने दोनों को-प्रत्यक्ष को अप्रत्यक्ष से, दृश्य को अदृश्य से, बाह्य को अंतर से जोड़कर भारतीय अनुभव की पूरी समग्रता से जीने का प्रयास किया था। उन्होंने बाह्य को सिर्फ इसलिए नहीं नकारा कि वह हमारे जीवन का सांसारिक पहलू है, न ही वे अदृश्य से सिर्फ इसलिए सम्मोहित हुए कि उसमें सब-कुछ शाश्वत और पवित्र है, बल्कि उन्होंने समूचे भारतीय यथार्थ को एक अखण्डित सत्य की तरह स्वीकार किया। वह हमारे परोक्ष को प्रत्यक्ष से, हमारे विश्वास को व्यवहार में बदलना चाहते थे ताकि हम इतिहास में अपने गौरव और अपनी शर्तों पर जी सकें। वह अपने प्रयास में असफल नहीं हुए, हम ही उनकी संभावनाओं तक पहुँचने में असफल रहे, किन्तु जो विकल्प उन्होंने सुझाया था, वह आज भी उतना जीवित और गौरवपूर्ण है, जितना पहले था। वह भारतीय संस्कृति का स्वप्न है जिससे आज समूची मानव-जाति की नियति जुड़ी है। क्या समय रहते हम उसे चुनने का साहस जुटा पाएँगे?
Q2796.उपर्युक्त गद्यांश का उचित शीर्षक क्या होगा?
- Aभारतीय अनुभव
- Bप्रत्यक्ष-परोक्ष
- Cमानव-जाति
- Dगांधी-मार्ग
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अवधारणा: शीर्षक पूरे गद्यांश का मुख्य विचार समेटे।
- पूरा गद्यांश गांधीजी की जीवन-दृष्टि और उनके सुझाए रास्ते पर है।
- बाक़ी तीन विकल्प गद्यांश के छोटे हिस्सों को ही छूते हैं।
ट्रिक: जो नाम/विषय हर वाक्य में केंद्र में हो, शीर्षक वही बनता है।
उत्तर: (D) गांधी-मार्ग
निर्देश (प्र. 96-100): निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
गांधीजी ने दोनों को-प्रत्यक्ष को अप्रत्यक्ष से, दृश्य को अदृश्य से, बाह्य को अंतर से जोड़कर भारतीय अनुभव की पूरी समग्रता से जीने का प्रयास किया था। उन्होंने बाह्य को सिर्फ इसलिए नहीं नकारा कि वह हमारे जीवन का सांसारिक पहलू है, न ही वे अदृश्य से सिर्फ इसलिए सम्मोहित हुए कि उसमें सब-कुछ शाश्वत और पवित्र है, बल्कि उन्होंने समूचे भारतीय यथार्थ को एक अखण्डित सत्य की तरह स्वीकार किया। वह हमारे परोक्ष को प्रत्यक्ष से, हमारे विश्वास को व्यवहार में बदलना चाहते थे ताकि हम इतिहास में अपने गौरव और अपनी शर्तों पर जी सकें। वह अपने प्रयास में असफल नहीं हुए, हम ही उनकी संभावनाओं तक पहुँचने में असफल रहे, किन्तु जो विकल्प उन्होंने सुझाया था, वह आज भी उतना जीवित और गौरवपूर्ण है, जितना पहले था। वह भारतीय संस्कृति का स्वप्न है जिससे आज समूची मानव-जाति की नियति जुड़ी है। क्या समय रहते हम उसे चुनने का साहस जुटा पाएँगे?
Q2797.गांधीजी ने दोनों को-प्रत्यक्ष को अप्रत्यक्ष से, दृश्य को अदृश्य से, बाह्य को अंतर से जोड़कर किस अनुभव की पूरी समग्रता से जीने का प्रयास किया था?
- Aअमेरिकी अनुभव
- Bयूरोपीय अनुभव
- Cविदेशी अनुभव
- Dभारतीय अनुभव
Show answer
अवधारणा: उत्तर सीधे गद्यांश की शुरुआती पंक्ति से मिलता है।
- पहली पंक्ति में साफ़ लिखा है कि यह समग्रता 'भारतीय' अनुभव की थी।
- अमेरिकी, यूरोपीय, विदेशी — गद्यांश में कहीं नहीं।
ट्रिक: तथ्यात्मक प्रश्न में प्रश्न के शब्द गद्यांश में खोजें, उत्तर उसी पंक्ति में होगा।
उत्तर: (D) भारतीय अनुभव
निर्देश (प्र. 96-100): निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
गांधीजी ने दोनों को-प्रत्यक्ष को अप्रत्यक्ष से, दृश्य को अदृश्य से, बाह्य को अंतर से जोड़कर भारतीय अनुभव की पूरी समग्रता से जीने का प्रयास किया था। उन्होंने बाह्य को सिर्फ इसलिए नहीं नकारा कि वह हमारे जीवन का सांसारिक पहलू है, न ही वे अदृश्य से सिर्फ इसलिए सम्मोहित हुए कि उसमें सब-कुछ शाश्वत और पवित्र है, बल्कि उन्होंने समूचे भारतीय यथार्थ को एक अखण्डित सत्य की तरह स्वीकार किया। वह हमारे परोक्ष को प्रत्यक्ष से, हमारे विश्वास को व्यवहार में बदलना चाहते थे ताकि हम इतिहास में अपने गौरव और अपनी शर्तों पर जी सकें। वह अपने प्रयास में असफल नहीं हुए, हम ही उनकी संभावनाओं तक पहुँचने में असफल रहे, किन्तु जो विकल्प उन्होंने सुझाया था, वह आज भी उतना जीवित और गौरवपूर्ण है, जितना पहले था। वह भारतीय संस्कृति का स्वप्न है जिससे आज समूची मानव-जाति की नियति जुड़ी है। क्या समय रहते हम उसे चुनने का साहस जुटा पाएँगे?
Q2798.समूचे भारतीय यथार्थ को एक ____ सत्य की तरह स्वीकार किया है। रिक्त स्थान को पूरा करें।
- Aपरोक्ष सत्य को
- Bखण्डित सत्य को
- Cअखण्डित सत्य को
- Dप्रत्यक्ष सत्य को
Show answer
अवधारणा: रिक्त शब्द गद्यांश की पंक्ति से ज्यों का त्यों लें।
- गांधीजी ने पूरे यथार्थ को बिना टुकड़ों में बाँटे, 'अखण्डित' (संपूर्ण) सत्य माना।
- खण्डित इसका उलटा है; परोक्ष/प्रत्यक्ष अन्य प्रसंग के शब्द हैं।
याद रखें: अखण्डित = अ + खण्डित — 'अ' उपसर्ग निषेध बताता है।
उत्तर: (C) अखण्डित सत्य को
निर्देश (प्र. 96-100): निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
गांधीजी ने दोनों को-प्रत्यक्ष को अप्रत्यक्ष से, दृश्य को अदृश्य से, बाह्य को अंतर से जोड़कर भारतीय अनुभव की पूरी समग्रता से जीने का प्रयास किया था। उन्होंने बाह्य को सिर्फ इसलिए नहीं नकारा कि वह हमारे जीवन का सांसारिक पहलू है, न ही वे अदृश्य से सिर्फ इसलिए सम्मोहित हुए कि उसमें सब-कुछ शाश्वत और पवित्र है, बल्कि उन्होंने समूचे भारतीय यथार्थ को एक अखण्डित सत्य की तरह स्वीकार किया। वह हमारे परोक्ष को प्रत्यक्ष से, हमारे विश्वास को व्यवहार में बदलना चाहते थे ताकि हम इतिहास में अपने गौरव और अपनी शर्तों पर जी सकें। वह अपने प्रयास में असफल नहीं हुए, हम ही उनकी संभावनाओं तक पहुँचने में असफल रहे, किन्तु जो विकल्प उन्होंने सुझाया था, वह आज भी उतना जीवित और गौरवपूर्ण है, जितना पहले था। वह भारतीय संस्कृति का स्वप्न है जिससे आज समूची मानव-जाति की नियति जुड़ी है। क्या समय रहते हम उसे चुनने का साहस जुटा पाएँगे?
Q2799.गांधीजी हमारे परोक्ष को प्रत्यक्ष में, हमारे विश्वास को व्यवहार में बदलना चाहते थे ताकि क्या हो सके?
- Aहम इतिहास में अपने गौरव और अपनी शर्तों पर जी सकें।
- Bहम इतिहास में अपनी संभावनाओं से जी सकें।
- Cहम इतिहास में अपनी इच्छा से जी सकें।
- Dहम इतिहास में अपने अतीत की तरह जी सकें।
Show answer
अवधारणा: 'ताकि' के बाद वाला अंश उद्देश्य बताता है।
- गांधीजी आस्था को आचरण में उतारना चाहते थे।
- मक़सद: भारतीय समाज सम्मान के साथ और स्वयं तय की गई शर्तों पर इतिहास में खड़ा हो।
ट्रिक: 'ताकि/जिससे' शब्द खोजें — उद्देश्य उसी के बाद लिखा होता है।
उत्तर: (A) हम इतिहास में अपने गौरव और अपनी शर्तों पर जी सकें।
निर्देश (प्र. 96-100): निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़िए और उस पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
गांधीजी ने दोनों को-प्रत्यक्ष को अप्रत्यक्ष से, दृश्य को अदृश्य से, बाह्य को अंतर से जोड़कर भारतीय अनुभव की पूरी समग्रता से जीने का प्रयास किया था। उन्होंने बाह्य को सिर्फ इसलिए नहीं नकारा कि वह हमारे जीवन का सांसारिक पहलू है, न ही वे अदृश्य से सिर्फ इसलिए सम्मोहित हुए कि उसमें सब-कुछ शाश्वत और पवित्र है, बल्कि उन्होंने समूचे भारतीय यथार्थ को एक अखण्डित सत्य की तरह स्वीकार किया। वह हमारे परोक्ष को प्रत्यक्ष से, हमारे विश्वास को व्यवहार में बदलना चाहते थे ताकि हम इतिहास में अपने गौरव और अपनी शर्तों पर जी सकें। वह अपने प्रयास में असफल नहीं हुए, हम ही उनकी संभावनाओं तक पहुँचने में असफल रहे, किन्तु जो विकल्प उन्होंने सुझाया था, वह आज भी उतना जीवित और गौरवपूर्ण है, जितना पहले था। वह भारतीय संस्कृति का स्वप्न है जिससे आज समूची मानव-जाति की नियति जुड़ी है। क्या समय रहते हम उसे चुनने का साहस जुटा पाएँगे?
Q2800.‘प्रत्यक्ष’ शब्द में किस संधि का प्रयोग हुआ है?
- Aयण स्वर संधि
- Bदीर्घ स्वर संधि
- Cगुण स्वर संधि
- Dवृद्धि स्वर संधि
Show answer
अवधारणा: इ/ई के बाद भिन्न स्वर आए तो इ/ई → य् (यण संधि)।
- प्रत्यक्ष = प्रति + अक्ष।
- इ + अ → य (त् + य = त्य)।
ट्रिक: यण पहचान: शब्द में 'त्य, त्व, ध्य, न्व' जैसा 'य/व' वाला संयुक्ताक्षर — जैसे इत्यादि, अत्यंत, स्वागत।
उत्तर: (A) यण स्वर संधि